हिन्दू पंचांग के हिसाब से जब अषाढ़ महीने की कृष्ण पक्ष का ग्यारहवां दिन आता है तब एक महत्त्वपूर्ण उपवास लोग करते हैं जिसको की योगिनी एकादशी के उपवास के नाम से जाना जाता है. इस उपवास को करने से लोग पापों और बीमारियों से मुक्ति पाते हैं.
योगिनी एकादशी व्रत और पूजा से लाभ:
- योगिनी एकादशी का व्रत उन लोगो के लिए बहुत लाभदायक है जो की किसी भी प्रकार के त्वचा रोगों से ग्रस्त है.
- साधको के लिए भी ये दिन बहुत ख़ास है, साधना को बढ़ाने के लिए ये दिन ख़ास है.
- ये व्रत पापों से भी मुक्त करता है.
- योगिनी एकादशी का व्रत और पूजा से सफलता के रास्ते खुलते हैं.
- जीवन की परेशानियां हटती हैं.
- इस व्रत को करने वाले को मृत्यु के पश्चात विष्णु लोक की प्राप्ति होती है |
क्या करना चाहिए योगिनी एकादशी को कृपा प्राप्त करने के लिए ?
- प्रातः काल जल्दी उठके अपने दैनिक कार्यो को करले फिर घर के मंदिर में भगवान् विष्णु के मूर्ती के सामने संकल्प ले की योगिनी एकादशी का उपवास आप अपनी किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए कर रहे हैं.
- इस दिन विष्णु जी की हो सके तो पंचोपचार पूजा करे पुरे दिन और रात उपवास रखे और वासुदेव जी की किसी मंत्र का जप करे.
- इस दिन झूट न बोले, किसी से गलत व्यवहार न करे, किसी जरूरतमंद की मदद करे, फल , कपडे, धन का जरूरतमंद को दान दे. ब्राह्मणों का आशीर्वाद ले.
- इस दिन अन्न ग्रहण न करे, फल , रस का प्रयोग करे, मोरधन का प्रयोग करे.
- योगिनी एकादशी का एक रहस्य ये भी है की ये दिन धन के देवता कुबेर जी से भी सम्बन्ध रखता है अतः इस दिन विष्णु जी के साथ कुबेर जी की पूजा की जाए तो भी बहुत अच्छा है.
- योगिकी एकादशी को पीपल पूजा भी बहुत लाभदायक होता है.
योगिनी एकादशी की कथा
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत का वर्णन पुराणों में अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सुख, समृद्धि तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम के यक्षराज राज्य करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन मानसरोवर से सुगंधित पुष्प लाकर भगवान शिव का पूजन किया करते थे। उनके पास हेममाली नाम का एक माली था, जिसका कार्य प्रतिदिन समय पर ताजे पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करना था।
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। वह अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करता था। एक दिन वह पत्नी के प्रेम में इतना मग्न हो गया कि समय पर पुष्प लाना भूल गया। भगवान शिव की पूजा का समय निकल गया और कुबेर को पूजा के लिए पुष्प नहीं मिले।
जब कुबेर को इस बात का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने हेममाली को दरबार में बुलाया और कर्तव्य में लापरवाही के कारण उसे कठोर दंड दिया। कुबेर ने शाप दिया कि वह कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर पृथ्वी पर गिरेगा और अपनी पत्नी से वियोग का दुख सहेगा।
शाप के प्रभाव से हेममाली तुरंत पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। वह जंगलों और पर्वतों में भटकता रहा तथा अत्यंत कष्टमय जीवन बिताने लगा।
एक दिन भटकते-भटकते वह महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँचा। उसने ऋषि के चरणों में प्रणाम किया और अपने शाप तथा दुखों की पूरी कथा सुनाई।
महर्षि मार्कण्डेय ने उसकी दयनीय अवस्था देखकर कहा, "यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करोगे, तो तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और तुम इस शाप से मुक्त हो जाओगे।"
हेममाली ने महर्षि के निर्देशानुसार पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ योगिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया। वह पुनः स्वस्थ, सुंदर और तेजस्वी हो गया तथा कुबेर के शाप से मुक्त होकर अपनी पत्नी विशालाक्षी से पुनः मिल गया। दोनों ने सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया।
योगिनी एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत रोग, दुख, दरिद्रता और मानसिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
कथा से मिलने वाली सीख
- अपने कर्तव्यों का सदैव ईमानदारी से पालन करना चाहिए।
- लापरवाही का परिणाम कभी-कभी अत्यंत गंभीर हो सकता है।
- सच्चे मन से किया गया पश्चाताप और भगवान की भक्ति जीवन को बदल सकती है।
- योगिनी एकादशी का व्रत पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
॥ श्री हरि विष्णवे नमः ॥

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