🌼 23 अगस्त 2026 – पुत्रदा एकादशी का महत्त्व और पूजन विधि 🌼
पुत्रदा एकादशी, जो इस वर्ष 23 अगस्त 2026, Ravivar को आ रही है, हिन्दू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी मानी जाती है। यह एकादशी विशेष रूप से संतान की प्राप्ति, संतान की उन्नति, तथा पारिवारिक सुख-शांति के लिए की जाती है।
इस एकादशी का नाम ही इसके उद्देश्य को दर्शाता है – 'पुत्रदा', अर्थात ‘पुत्र देने वाली’। विशेष रूप से वे दंपत्ति जो संतान सुख से वंचित हैं या संतान की दीर्घायु, बुद्धिमत्ता एवं उन्नति के लिए चिंतित रहते हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
जो भी दंपत्ति स्वस्थ संतान चाहते हैं, उन्हें इस दिन विशेष रूप से पूजा करनी चाहिए। हिन्दुओं की मान्यता है कि श्राद्ध कर्म पुत्र द्वारा ही किया जाता है, परन्तु आज के समय में बेटियां भी अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।
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| Putrada Ekadashi Vrat Ka Jyotish Mahattw |
🌙 पुत्रदा एकादशी 2026 तिथि व समय
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 23 अगस्त 2026, 2:02 AM
- एकादशी तिथि समाप्त: 24 अगस्त 2026, 04:19 PM
- व्रत तिथि: 23 अगस्त 2026 (Ravivar)
- पारण समय: 24 अगस्त 2026, 01:41 PM – 04:16 PM
🔆 पूजा की कुछ खास बातें:
- पति-पत्नी दोनों यह व्रत रख सकते हैं।
- उपवास में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- दिनभर व रात्रि को अन्न ग्रहण न करें।
- भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा करें।
- विष्णु सहस्त्रनाम, मंत्र जाप, भजन-कीर्तन करें।
- संतान सुख की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करें।
✨ पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व
- संतान सुख की प्राप्ति: व्रत के प्रभाव से संतान योग बनता है।
- संतान की उन्नति: बच्चों को स्वास्थ्य, दीर्घायु, सद्बुद्धि मिलती है।
- पुण्य लाभ: पापों से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- पूर्व जन्म के दोषों से मुक्ति: यह व्रत पूर्व जन्म के दोषों को शांत करता है।
🛐 व्रत विधि (पूजन विधि)
- व्रत की पूर्व रात्रि को सात्विक भोजन करें।
- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा पर तुलसी, पीले पुष्प, चंदन अर्पित करें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें।
- दिनभर उपवास रखें – फलाहार या निर्जल।
- रात्रि को जागरण करें – भजन, कथा, कीर्तन करें।
- द्वादशी को ब्राह्मण को दान देकर व्रत का पारण करें।
📖 एकादशी की पौराणिक कथा
पद्म पुराण के अनुसार, भद्रावती के राजा Suketuman और रानी शैव्या संतानहीन थे। राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए वन में मुनियों से पुत्रदा एकादशी के बारे में जानकर व्रत किया और उन्हें योग्य पुत्र की प्राप्ति हुई।
एक समय की बात है। द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
“हे प्रभु! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत का क्या महत्व है और इसकी कथा क्या है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे धर्मराज! श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। यह भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित अत्यंत पुण्यदायी एकादशी है। इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने और इसकी कथा सुनने से मनुष्य को महान पुण्य की प्राप्ति होती है। अब मैं तुम्हें इसकी पवित्र कथा सुनाता हूं।”
बहुत समय पहले भद्रावती नगरी में राजा सुकेतुमान का राज्य था। राजा बहुत धर्मात्मा, प्रजावत्सल और दयालु थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी और राजमहल में किसी प्रकार की कमी नहीं थी।
राजा के पास धन-दौलत, हाथी-घोड़े, विशाल सेना और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। उनकी पत्नी रानी शैव्या भी अत्यंत धर्मपरायण और सद्गुणों से संपन्न थीं।
लेकिन राजा सुकेतुमान के जीवन में एक बहुत बड़ा दुख था।
उनके कोई संतान नहीं थी।
राजा दिन-रात इसी चिंता में डूबे रहते थे कि उनके बाद उनके वंश को कौन आगे बढ़ाएगा। उन्हें अपने पूर्वजों की भी चिंता सताती रहती थी। वे सोचते थे कि यदि उनकी संतान नहीं होगी तो उनके बाद पितरों के लिए श्राद्ध और पिंडदान कौन करेगा?
इसी चिंता के कारण राजा धीरे-धीरे बहुत दुखी रहने लगे।
एक दिन राजा इतना व्याकुल हुए कि उन्होंने महल छोड़कर अकेले वन की ओर जाने का निर्णय कर लिया। वे घोड़े पर सवार होकर घने जंगल में पहुंच गए।
जंगल बहुत विशाल और सुनसान था। चलते-चलते राजा काफी दूर निकल गए। उन्हें भूख और प्यास लगने लगी, लेकिन उनकी चिंता इतनी अधिक थी कि वे लगातार आगे बढ़ते रहे।
कुछ समय बाद राजा को एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया।
उस सरोवर का जल अत्यंत निर्मल था। उसके चारों ओर सुंदर वृक्ष और कमल के फूल खिले हुए थे। सरोवर के किनारे कुछ ऋषि-मुनि बैठे भगवान का ध्यान और वेदों का पाठ कर रहे थे।
राजा घोड़े से उतरे और उन महान ऋषियों के पास पहुंचे।
राजा ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया।
ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और उनके दुख का कारण पूछा।
राजा ने विनम्रता से कहा—
“हे महात्माओं! मैं भद्रावती नगरी का राजा सुकेतुमान हूं। मेरे पास किसी वस्तु की कमी नहीं है, लेकिन मैं संतानहीन हूं। इसी कारण मेरा मन हमेशा दुखी रहता है। कृपा करके मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे संतान की प्राप्ति हो सके।”
ऋषियों ने राजा की बात ध्यान से सुनी।
फिर उन्होंने कहा—
“हे राजन! आज श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। यदि आप श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करें और भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा करें, तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।”
ऋषियों ने राजा को पुत्रदा एकादशी व्रत की विधि बताई।
राजा ने उसी समय संकल्प लिया कि वे पूरी श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु का व्रत करेंगे।
उन्होंने एकादशी के दिन स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र धारण किए और भगवान श्रीहरि की पूजा की। उन्होंने दिनभर उपवास रखा और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए भजन-कीर्तन किया।
रात में राजा ने जागरण किया और पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु की आराधना की।
राजा की भक्ति और श्रद्धा से भगवान श्रीहरि प्रसन्न हुए।
भगवान विष्णु ने राजा को दर्शन देकर आशीर्वाद दिया—
“हे राजन! तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। तुम्हें एक योग्य और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।”
भगवान का आशीर्वाद पाकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और अपनी नगरी लौट आए।
कुछ समय बाद रानी शैव्या ने एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
राजा सुकेतुमान और रानी शैव्या की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया।
राजा ने पुत्रदा एकादशी के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा को हृदय से स्वीकार किया। उनका पुत्र बड़ा होकर गुणवान, धर्मपरायण और वीर बना तथा उसने आगे चलकर राज्य का भार संभाला।
तभी से मान्यता चली आ रही है कि पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धा और भक्ति से करने से भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और संतान के सुख, उसकी उन्नति तथा परिवार की मंगलकामना के लिए यह व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है। पुत्रदा एकादशी की कथा का मूल प्रसंग राजा सुकेतुमान और उनके संतान-सुख से जुड़ा है।
🌺 विशेष टिप्स
- भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पित अवश्य करें।
- पूजा करते समय संतान सुख हेतु संकल्प लें।
- पितृ दोष या संतान बाधा योग वालों के लिए यह दिन विशेष फलदायी है।
🔍 क्या करें संतान सुख के लिए?
- अपनी कुंडली किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से दिखाएं।
- संतान सुख हेतु विशेष पूजा, रत्न या मन्त्रों का सहारा लें।
- पितृ दोष, संतान बाधा योग का समाधान जानें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- Q1. पुत्रदा एकादशी साल में कितनी बार आती है?
👉 दो बार – पौष और श्रावण शुक्ल पक्ष। - Q2. क्या यह व्रत केवल संतानहीन लोग ही करें?
👉 नहीं, सभी कर सकते हैं संतान की भलाई हेतु। - Q3. क्या व्रत में फलाहार किया जा सकता है?
👉 हाँ, फल, दूध, साबूदाना आदि लें। - Q4. पुत्रदा एकादशी की पूजा किस देवता की होती है?
👉 भगवान विष्णु की। - Q5. क्या महिलाएं और पुरुष दोनों यह व्रत कर सकते हैं?
👉 हां, दोनों कर सकते हैं संतान सुख के लिए।
🙏 निष्कर्ष
23 अगस्त 2026 की पुत्रदा एकादशी एक दुर्लभ और शुभ अवसर है, जो संतान सुख की प्राप्ति और पारिवारिक समृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी है। श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान विष्णु की आराधना करें और जीवन को सुखमय बनाएं।
🌸 जय श्री विष्णु 🌸
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