🌸 संतान सप्तमी व्रत — कब है?
संतान सप्तमी का व्रत 18 सितंबर को रखा जाएगा।
📅 सप्तमी तिथि
| विवरण | समय |
|---|---|
| सप्तमी तिथि प्रारंभ | 17 सितंबर, सुबह लगभग 10:48 बजे |
| सप्तमी तिथि समाप्त | 18 सितंबर, दोपहर लगभग 1:01 बजे |
| व्रत का दिन | उदया तिथि के अनुसार 18 सितंबर |
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| Santan Saptmi Ka Vrat Kab Hai | Katha |
🪔 संतान सप्तमी पूजा का शुभ समय
संतान सप्तमी की पूजा दिन में तथा प्रदोष काल में की जा सकती है।
☀️ दिन का पूजा मुहूर्त
दोपहर 12:08 बजे से 12:57 बजे तक
🌅 प्रदोष काल
शाम 5:39 बजे से 7:09 बजे तक
⚠️ राहु काल
सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक
इसलिए दिन में पूजा करते समय राहु काल का ध्यान रखें। प्रदोष काल में भी पूजा की जा सकती है।
🙏 संतान सप्तमी की पूजा के खास नियम
देवता
संतान सप्तमी पर मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
🧵 सात गांठ वाला कलावा
- 7 गांठ वाला कलावा/सूती धागा लिया जाता है।
- इसे हल्दी से रंगकर भगवान शिव को समर्पित किया जाता है।
- पूजा के बाद यह धागा संतान की कलाई पर बांधा जाता है।
- इस दिन पूजा में पुए का भोग लगाया जाता है।
🌺 संतान प्राप्ति हेतु संतान गोपाल मंत्र
पूजा के समय श्रद्धापूर्वक संतान गोपाल मंत्र का जाप किया जा सकता है:
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥
🌼 मंत्र का अर्थ
हे देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण, हे गोविंद, हे वासुदेव और जगत के स्वामी! मैं आपकी शरण में आया/आई हूँ। कृपया मुझे संतान का सुख प्रदान करें।
🙏 श्रद्धा, भक्ति और संकल्प के साथ भगवान शिव-पार्वती एवं श्रीकृष्ण का स्मरण करें।
🌺 संतान सप्तमी व्रत की कथा 🌺
प्राचीन समय की बात है। अयोध्या नगरी में भगवान श्रीराम के वंश में नहुष नाम के एक राजा हुए। उनकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।
एक बार राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी वन में विहार करने गए। वहाँ उनकी भेंट महर्षि लोमश से हुई। राजा और रानी ने श्रद्धापूर्वक महर्षि को प्रणाम किया और उनसे अपने जीवन के कल्याण का उपाय पूछा।
महर्षि लोमश ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत का महात्म्य बताया। उन्होंने कहा—
“हे राजन्! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को विधिपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके संतान सप्तमी का व्रत करने से संतान की प्राप्ति होती है, संतान की रक्षा होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।”
महर्षि ने आगे बताया कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से संतान संबंधी कष्ट दूर होते हैं तथा संतान दीर्घायु और सुखी होती है।
रानी चंद्रमुखी ने महर्षि के बताए अनुसार संतान सप्तमी का व्रत करने का संकल्प लिया। उन्होंने भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की तथा दिनभर श्रद्धापूर्वक व्रत रखा।
पूजा के समय उन्होंने भगवान शिव-पार्वती से प्रार्थना की—
“हे माता पार्वती! हे भगवान शिव! हमें स्वस्थ, दीर्घायु और सद्गुणी संतान का आशीर्वाद प्रदान करें। हमारी संतान की सदैव रक्षा करें और हमारे परिवार में सुख-शांति बनाए रखें।”
भगवान शिव और माता पार्वती रानी की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया।
कुछ समय बाद रानी चंद्रमुखी को एक सुंदर और स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने पुत्र का पालन-पोषण बड़े प्रेम और संस्कारों के साथ किया। उनका पुत्र बड़ा होकर धर्मात्मा, बुद्धिमान और वीर बना।
कहा जाता है कि जो स्त्री श्रद्धापूर्वक संतान सप्तमी का व्रत करती है, उसे भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। संतान की रक्षा होती है, संतान दीर्घायु होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
अतः हे भगवान शिव! हे माता पार्वती! जिस प्रकार आपने रानी चंद्रमुखी को संतान का सुख प्रदान किया, उसी प्रकार सभी व्रती माताओं को स्वस्थ, सुखी, दीर्घायु और संस्कारी संतान का आशीर्वाद प्रदान करें।
जय माता पार्वती।
संतान सप्तमी माता की जय।

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