चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाने वाली शीतला सप्तमी का पर्व विशेष रूप से माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन माताएं अपने बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं और शीतला माता की पूजा करती हैं। मान्यता है कि इस दिन ठंडा भोजन (बासी या एक दिन पहले बनाया हुआ) ग्रहण किया जाता है और पूजा के बाद शीतला माता की कथा अवश्य सुननी या पढ़नी चाहिए।
इस वर्ष शीतला सप्तमी 10 मार्च को मनाई जा रही है। आइए पढ़ते हैं शीतला माता की प्रेरणादायक कथा।
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| Sheetla Saptmi Ki Katha |
शीतला सप्तमी की कथा
बहुत समय पहले एक गांव में एक ब्राह्मण दंपति रहते थे। उनके दो पुत्र थे और दोनों की शादी हो चुकी थी। लेकिन विवाह के कई वर्षों बाद तक दोनों बहुओं को संतान का सुख नहीं मिला। लंबे इंतजार और प्रार्थनाओं के बाद आखिरकार दोनों को संतान प्राप्त हुई। पूरे घर में खुशियों का माहौल था।
कुछ समय बाद शीतला सप्तमी का पावन पर्व आया। परंपरा के अनुसार घर में एक दिन पहले ही ठंडा भोजन तैयार किया गया, क्योंकि इस दिन केवल ठंडा भोजन ही ग्रहण किया जाता है।
लेकिन दोनों बहुओं के मन में चिंता घर कर गई। वे सोचने लगीं — अगर हम ठंडा भोजन खाएंगे तो कहीं हमारे छोटे बच्चे बीमार न पड़ जाएं। इसी डर के कारण उन्होंने चुपचाप किसी को बताए बिना अपने लिए दो गरम बाटियां बना लीं।
उधर सास ने पूरे विधि-विधान से शीतला माता की पूजा की और कथा सुनी। पूजा के बाद वह माता के भजन गाने में लीन हो गईं। इसी बीच दोनों बहुएं बच्चों का बहाना बनाकर घर लौट आईं और छिपकर गरम-गरम भोजन कर लिया।
कुछ देर बाद जब सास घर आई तो उसने कहा,
“बहुओं, अब तुम भी भोजन कर लो।”
दोनों बहुएं चुपचाप अपने काम में लग गईं। सास ने फिर कहा,
“बच्चे काफी देर से सो रहे हैं, उन्हें जगा कर कुछ खिला दो।”
जब दोनों बहुएं बच्चों को जगाने गईं तो यह देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई—दोनों बच्चे मृत पड़े थे।
यह देखकर वे जोर-जोर से रोने लगीं और सास के पास जाकर सारी सच्चाई बता दी। सास यह सुनकर बहुत क्रोधित हो गई और बोली—
पश्चाताप और शीतला माता की कृपा
दुखी और निराश दोनों बहुएं अपने मृत बच्चों को टोकरी में रखकर घर से निकल पड़ीं। रास्ते में उन्हें एक पुराना खेजड़ी का वृक्ष दिखाई दिया। थकी हुई बहुएं उसी वृक्ष के नीचे बैठ गईं।
वहां दो स्त्रियां बैठी थीं — उनका नाम था ओरी और शीतला। उनके बालों में बहुत सी जुएं थीं। दयालु बहुओं ने थकान के बावजूद उनके सिर से जुएं निकालना शुरू कर दिया।
जैसे-जैसे जुएं निकलती गईं, दोनों स्त्रियों को बहुत शीतलता और आराम महसूस होने लगा। प्रसन्न होकर उन्होंने कहा—
यह सुनकर बहुओं की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने दुखी स्वर में कहा—
“हम अपने बच्चों को खोकर भटक रही हैं। हमें अभी तक शीतला माता के दर्शन भी नहीं हुए।”
तभी उनमें से एक स्त्री क्रोधित होकर बोली—
इतना सुनते ही दोनों बहुओं को समझ आ गया कि सामने स्वयं शीतला माता विराजमान हैं। वे तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ीं और विनती करने लगीं—
“माता, हमें क्षमा कर दीजिए। हमने अज्ञानवश गलती की है। अब कभी ऐसा नहीं करेंगे।”
कथा का सुखद अंत
दोनों की सच्ची पश्चाताप देखकर शीतला माता का हृदय पिघल गया। उन्होंने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया।
यह चमत्कार देखकर दोनों बहुएं अत्यंत प्रसन्न हुईं। वे अपने बच्चों को लेकर घर लौट आईं और पूरे गांव को शीतला माता के दर्शन और उनकी कृपा के बारे में बताया।
इसके बाद पूरे गांव में उनका भव्य स्वागत हुआ। दोनों बहुओं ने प्रण लिया कि वे गांव में शीतला माता का मंदिर बनवाएंगी और हर वर्ष चैत्र मास की शीतला सप्तमी को श्रद्धा से व्रत रखकर केवल ठंडा भोजन ही ग्रहण करेंगी।
कथा से मिलने वाली सीख
- परंपराओं और व्रतों का पालन श्रद्धा और विश्वास से करना चाहिए।
- माता शीतला बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं।
- सच्चे पश्चाताप और भक्ति से देवी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
इसीलिए शीतला सप्तमी के दिन पूजा के बाद श्रद्धापूर्वक शीतला माता की कथा अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए।

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