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kali Shanti Strotram Lyrics with Meaning In Hindi

Kali Shanti Strotram Lyrics with Meaning In Hindi, Kali Puja Mantra, Maa Kali Ki Kripa Kaise Prapt Kare?. ॥ काली शान्तिस्तोत्रम् ॥ “काली शान्तिस्तोत्रम्” का पाठ अत्यंत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रदान करने वाला माना जाता है। देवी काली को शक्ति, संरक्षण और नकारात्मक शक्तियों के विनाश की प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से साधक के भीतर साहस, आत्मविश्वास और आंतरिक शांति का विकास होता है। नियमित पाठ मन को स्थिर करता है, भय और चिंता को कम करता है तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी मंत्रात्मक ध्वनियाँ वातावरण को शुद्ध कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्तोत्र संकटों से रक्षा करता है और भक्त को देवी की कृपा एवं संरक्षण का अनुभव कराता है, जिससे जीवन में संतुलन, शांति और आत्मबल की वृद्धि होती है। काली शान्तिस्तोत्रम् काली काली महाकालि कालिके पापहारिणि । धर्ममोक्षप्रदे देवि गुह्यकालि नमोऽस्तुते ॥ १॥ सङ्ग्रामे विजयं देहि धनं देहि सदा गृ...

kali Shanti Strotram Lyrics with Meaning In Hindi

Kali Shanti Strotram Lyrics with Meaning In Hindi, Kali Puja Mantra, Maa Kali Ki Kripa Kaise Prapt Kare?.

॥ काली शान्तिस्तोत्रम् ॥

“काली शान्तिस्तोत्रम्” का पाठ अत्यंत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रदान करने वाला माना जाता है। देवी काली को शक्ति, संरक्षण और नकारात्मक शक्तियों के विनाश की प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से साधक के भीतर साहस, आत्मविश्वास और आंतरिक शांति का विकास होता है। नियमित पाठ मन को स्थिर करता है, भय और चिंता को कम करता है तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी मंत्रात्मक ध्वनियाँ वातावरण को शुद्ध कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्तोत्र संकटों से रक्षा करता है और भक्त को देवी की कृपा एवं संरक्षण का अनुभव कराता है, जिससे जीवन में संतुलन, शांति और आत्मबल की वृद्धि होती है।

Kali Shanti Strotram Lyrics with Meaning In Hindi, Kali Puja Mantra, Maa Kali Ki Kripa Kaise Prapt Kare?.


काली शान्तिस्तोत्रम्

काली काली महाकालि कालिके पापहारिणि ।
धर्ममोक्षप्रदे देवि गुह्यकालि नमोऽस्तुते ॥ १॥

सङ्ग्रामे विजयं देहि धनं देहि सदा गृहे ।
धर्मकामार्थसम्पत्तिं देहि कालि नमोऽस्तुते ॥ २॥

उल्कामुखि ललज्जिह्वे घोररावे भगप्रिये ।
श्मशानवासिनि प्रेते शवमांसप्रियेऽनघे ॥ ३॥

अरण्य चारिणि शिवे कुलद्रव्यमयीश्वरि ।
प्रसन्नाभव देवेशि भक्तस्य मम कालिके ॥ ४॥

शुभानि सन्तु कौलानां नश्यन्तु द्वेषकारकाः ।
निन्दाकरा क्षयं पान्तुये च हास्य प्रकुर्वते ॥ ५॥

ये द्विषन्ति जुगुप्सन्ते ये निन्दन्ति हसन्ति ये ।
येऽसूयन्ते च शङ्कन्ते मिथ्येति प्रवदन्ति ये ॥ ६॥

ते डाकिनीमुखे यान्तु सदारसुतबान्धवाः ।
पिबत्वं शोणितं तस्य चामुण्डा मांसमत्तु च ॥ ७॥

आस्थीनिचर्वयन्त्वस्य योगिनी भैरवीगणाः ।
यानिन्दागमतन्त्रादौ या शक्तिषु कुलेषु या ॥ ८॥

कुलमार्गेषु या निन्दा सा निन्दा तव कालिके ।
त्वन्निन्दाकारिणां शास्त्री त्वमेव परमेश्वरि ॥ ९॥

न वेदं न तपो दानं नोपवासादिकं व्रतम् ।
चान्द्रायणादि कृच्छं च न किञ्चिन्मानयाम्यहम् ॥ १०॥

किन्तु त्वच्चरणाम्भोज सेवां जाने शिवाज्ञया ।
त्वदर्चा कुर्वतो देवि निन्दापि सफला मम ॥ ११॥

राज्यं तस्य प्रतिष्ठा च लक्ष्मीस्तस्य सदा स्थिरा ।
तस्य प्रभुत्वं सामर्थ्यं यस्य त्वं मस्तकोपरि ॥ १२॥

धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं सफलं जीवतं मम ।
यस्य त्वच्चरणद्वन्दे मनो निविशते सदा ॥ १३॥

दैत्याः विनाशमायान्तु क्षयं यान्तु च दानवाः ।
नश्यन्तु प्रेतकूष्माण्डा राक्षसा असुरास्तथा ॥ १४॥

पिशाच भूत वेतालां क्षेत्रपाला विनायकाः ।
गुह्यकाः घोणकाश्चैव विलीयन्ता सहस्रधा ॥ १५॥

भारुण्डा जम्भकाः स्कान्दाः प्रमथाः पितरस्तथा ।
योगिन्यो मातरश्चापि डाकिन्यः पूतनास्तथा ॥ १६॥

भस्मीभवन्तु सपदि त्वत् प्रसादात् सुरेश्वरि ।
दिवाचरा रात्रिचरा ये च सन्ध्याचरा अपि ॥ १७॥

शाखाचरा वनचराः कन्दराशैलचारिणः ।
द्वेष्टारो ये जलचरा गुहाबिलचरा अपि ॥ १८॥

स्मरणादेव ते सर्वे खण्डखण्डा भवन्तु ते ।
सर्पानागा यातुधाना दस्युमायाविनस्तथा ॥ १९॥

हिंसका विद्विषो निन्दाकरा ये कुलदूषकाः ।
मारणोच्चाटनोन्मूल द्वेष मोहन कारकाः ॥ २०॥

कृत्याभिचारकर्तारः कौलविश्वासघातकाः ।
त्वत्प्रसादाज्जगद्धात्रि निधनं यान्तु तेऽखिलाः ॥ २१॥

नवग्रहाः सतिथयो नक्षत्राणि च राशयः ।
सङ्क्रान्तयोऽब्दा मासाश्च ऋतवो द्वे तथायने ॥ २२॥

कलाकाष्ठामुहुर्ताश्च पक्षाहोरात्रयस्तथा ।
मन्वतराणि कल्पाश्च युगानि युगसन्धयः ॥ २३॥

देवलाकाः लोकपालाःपितरो वह्नयस्तथा ।
अध्वरा निधयो वेदाः पुराणागमसंहिता ॥ २४॥

एते मया कार्तिता ये ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।
आज्ञया गुह्यकाल्यास्ते मम कुर्वन्तु मङ्गलम् ॥ २५॥

भवन्तु सर्वदा सौम्याः सर्वकालं सुखावहाः ।
आरोग्यं सर्वदा मेऽस्तु युद्धे चैवापराजयः ॥ २६॥

दुःखहानिः सदैवास्तां विघ्ननाशः पदे पदे ।
अकालमृत्यु दारिद्र्यं बन्धनं नृपतेर्भयम् ॥ २७॥

गुह्यकाल्याः प्रसादेन न कदापि भवेन्मम ।
सन्त्विन्द्रियाणि सुस्थानि शान्तिः कुशलमस्तु मे ॥ २८॥

वाञ्छाप्तिर्मनसः सौख्यं कल्याणं सुप्रजास्तथा ।
बलं विक्तं यशः कान्तिवृद्धिर्विद्या महोदयः ॥ २९॥

दीर्घायुरप्रधृष्यत्वं वीर्यं सामर्थ्यमेव च ।
विनाशो द्वेषकर्तृणां कौलिकानां महोन्नतिः ।
जायतां शान्तिपाठेन कुलवर्त्म धृतात्मनाम् ॥ ३०॥

इति काल्याः शान्तिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।


Hindi Meanings :

काली शान्तिस्तोत्रम् – श्लोकों का हिन्दी अर्थ

  • (१) हे काली, महाकाली, कालिका, पापों का नाश करने वाली देवी! धर्म और मोक्ष देने वाली गुह्यकाली! आपको नमस्कार है।
  • (२) हे काली! युद्ध में विजय दें, घर में सदा धन दें। धर्म, काम और अर्थ की सम्पत्ति प्रदान करें।
  • (३) अग्नि समान मुख वाली, लाल जिह्वा वाली, भयंकर स्वर करने वाली देवी! श्मशान में रहने वाली, प्रेतों और शवमांस की प्रिय, निष्पाप देवी!
  • (४) वन में विचरण करने वाली, कल्याणमयी शिवा, कुल की सम्पत्ति स्वरूप ईश्वरी! हे कालिके, मेरे प्रति प्रसन्न हों।
  • (५) कौल साधकों के लिए सब शुभ हो। द्वेष और निंदा करने वाले नष्ट हों। उपहास करने वाले क्षीण हो जाएँ।
  • (६) जो द्वेष, घृणा, निंदा, उपहास, ईर्ष्या और शंका करते हैं तथा इसे मिथ्या कहते हैं —
  • (७) वे अपने परिवार सहित डाकिनी के मुख में जाएँ। चामुंडा उनका रक्त पिए और मांस भक्षण करे।
  • (८) योगिनी और भैरवी गण उनकी हड्डियाँ चबा जाएँ। जो तंत्र, आगम, शक्ति और कुलमार्ग की निंदा करते हैं —
  • (९) कुलमार्ग की निंदा आपकी ही निंदा है, हे कालिके। ऐसे निंदकों को दंड देने वाली आप ही परमेश्वरी हैं।
  • (१०) मैं न वेद, न तप, न दान, न उपवास या कठिन व्रतों को मानता हूँ।
  • (११) मैं केवल आपके चरणकमलों की सेवा जानता हूँ। आपकी पूजा करने वाले के लिए निंदा भी फलदायक होती है।
  • (१२) जिसके सिर पर आप विराजती हैं, उसे राज्य, प्रतिष्ठा, स्थिर लक्ष्मी, प्रभुत्व और सामर्थ्य प्राप्त होता है।
  • (१३) मैं धन्य और कृतार्थ हूँ; मेरा जीवन सफल है क्योंकि मेरा मन सदा आपके चरणों में स्थित है।
  • (१४) दैत्य, दानव, प्रेत, कूष्माण्ड, राक्षस और असुर नष्ट हों।
  • (१५) पिशाच, भूत, वेताल, क्षेत्रपाल, विनायक, गुह्यक आदि सब सहस्रों भागों में विलीन हो जाएँ।
  • (१६) भारुण्ड, जम्भक, स्कन्द, प्रमथ, पितर, योगिनी, माताएँ, डाकिनी और पूतना भी नष्ट हों।
  • (१७) हे सुरेश्वरी! आपके प्रसाद से दिन, रात और संध्या में विचरण करने वाले दुष्ट भस्म हो जाएँ।
  • (१८) जो वृक्षों, वनों, पर्वतों, गुफाओं या जल में रहने वाले द्वेषी हैं — वे भी नष्ट हों।
  • (१९) आपके स्मरण मात्र से सर्प, नाग, यातुधान, डाकू और मायावी खंड-खंड हो जाएँ।
  • (२०) हिंसक, द्वेषी, निंदक, कुलदूषक तथा मारण-उच्चाटन-मोहन करने वाले नष्ट हों।
  • (२१) कृत्या और अभिचार करने वाले, कौल विश्वास के विश्वासघाती — हे जगद्धात्रि! आपके प्रसाद से नष्ट हों।
  • (२२–२५) नवग्रह, तिथि, नक्षत्र, राशियाँ, संक्रांति, वर्ष, मास, ऋतु, अयन, काल-विभाग, मन्वंतर, कल्प, युग, देवता, लोकपाल, वेद, पुराण और आगम — सब मेरे लिए मंगलकारी हों।
  • (२६) वे सदा सौम्य और सुखदायक हों। मुझे आरोग्य मिले और युद्ध में कभी पराजय न हो।
  • (२७) दुःख और विघ्नों का नाश हो। अकाल मृत्यु, दरिद्रता, बंधन और राजभय मुझे न हो।
  • (२८) गुह्यकाली की कृपा से मेरी इन्द्रियाँ स्वस्थ रहें, मुझे शांति और कुशलता प्राप्त हो।
  • (२९) मनोकामना सिद्ध हो, सुख, कल्याण, श्रेष्ठ संतान, बल, धन, यश, कान्ति, विद्या और उन्नति मिले।
  • (३०) दीर्घायु, अपराजेयता, वीर्य और सामर्थ्य प्राप्त हो। द्वेषियों का नाश और कौलिकों की उन्नति हो। शांति से कुलमार्ग में स्थित लोगों का कल्याण हो।

निष्कर्ष:

“काली शान्तिस्तोत्रम्” का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ व्यक्ति के जीवन में शांति, साहस, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि आत्मशक्ति को जागृत करने का साधन है।

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