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Kundlini Shakti Kya hai kaise hota hai shatchakra bhedan

Kundalini Shakti kya hai, कैसे जागृत करें कुंडलिनी शक्ति को, शक्ति चक्रों को जाग्रत करने के बीज मन्त्र कौन से है ?, कैसे जागृत होती है कुंडलिनी शक्ति ? 

कुंडलिनी साधना अत्यंत ही रहस्यमय और गोपनीय साधना है जिसका वर्णन हमारे योग ग्रंथो में दिया गया है | परन्तु ये सभी के लिए आवश्यक है, ये जीवन की सत्यता को समझने के लिए अति आवश्यक है | अपने अंदर की सुप्त शक्तियों को जगाने का सबसे सशक्त तरीका है | 

अगर आप ढूंढ रहे हैं मूलाधार चक्र जगाने का मंत्र/Mooladhaar chakra jagaane ka mantra, स्वाधिष्ठान चक्र जगाने का मंत्र/Swadhishthaan chakra jagaane ka mantra, मणिपुर चक्र जगाने का मंत्र/Manipurak chakra jagaane ka mantra, अनहद चक्र जगाने का मंत्र/Anhad chakra jagaane ka mantra, विशुद्ध चक्र जगाने का मंत्र/Vishuddh chakra jagaane ka mantra, आज्ञा चक्र जगाने का मंत्र/Agya chakra jagaane ka mantra, सहस्त्र दल चक्र जगाने का मंत्र/Sahastrdal chakra jagaane ka mantra. 

अनुक्रमणिका:

  • कुण्डलिनी शक्ति क्या है/kundlini shakti kya hai ?
  • शक्ति चक्र क्या हैं?/Shakti chakra kya hai?
  • सुषुम्ना नाडी का महत्व/Sushumna nadi ka mahattw 
  • चक्रों को जागृत करने के मंत्र कौन से है /Chakro ko jagaane ke mantra kaun se hain 
  • षट्चक्र भेदन के फायदे क्या है ?
  • कैसे जगाएं कुंडलिनी ?

Kundalini Shakti kya hai, कैसे जागृत करें कुंडलिनी शक्ति को, योग चक्र, षटचक्र, सप्त चक्र, चक्र ध्यान, शक्ति चक्रों को जाग्रत करने के बीज मन्त्र
Kundlini Shakti Kya hai kaise hota hai shatchakra bhedan

कुण्डलिनी शक्ति क्या है ?

भारतीय योग ग्रंथो में कुण्डलिनी योग का वर्णन मिलता है अर्थात मूलाधार चक्र में सोई हुई शक्ति को जगाना होता है |

कुण्डलिनी शक्ति (Kundalini Shakti) को अनेक प्रकार से जगाया जा सकता है जैसे की 

  • समर्थ गुरु द्वारा शक्तिपात लेके |
  • हठ योग के द्वारा |
  • भक्तियोग द्वारा
  • मंत्र साधना द्वारा आदि 

जब कुंडलिनी जागृत होती है तो षट्चक्र वेधन होता है अर्थात हमारे शरीर के अन्दर मौजूद शक्ति केंद्र जागृत होना शुरू होते हैं जिसके द्वारा साधक को विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है और साथ ही अनेक प्रकार की सिद्धियाँ भी प्राप्त होने लगती है |

कुंडलिनी शक्ति जब जागृत होती है तो सुषुम्ना नाडी से होते हुए ऊपर की और चलती है और शटचक्रभेदन होना शुरू होता है | ये चक्र निम्न लिखित हैं -

  1. मूलाधार चक्र 
  2. स्वाधिष्ठान चक्र 
  3. मणिपुर चक्र 
  4. अनहद चक्र 
  5. विशुद्ध चक्र 
  6. आज्ञा चक्र 
  7. सहस्त्र दल चक्र 

जिन जिन चक्रों को भेदते हुए महाशक्ति कुंडलिनी आगे बढती है उन उन चक्रों में सुप्त शक्तियां जागृत होने लगती है और साधक को विभिन्न प्रकार के दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती है |

योग ग्रन्थों के अनुसार शिव का वास सश्त्रदल चक्र में माना गया है और शक्ति का वास मूलाधार में माना गया है | जब शक्ति जागृत होक मूलाधार से सहस्त्रधार में शिव से मिलती है तब साधक पूर्ण हो जाता है, उसके लिए कुछ भी छुपा नहीं रहता है, हर प्रकार की सिद्धि उसके पास होती है, वो मुक्त हो जाता है, वो समाधि का पूर्ण आनंद ले पाता है | 

अहम् ब्रह्मास्मि का अनुभव साधक को हो जाता है |

इसीलिए कुंडलिनी जागरण का महत्त्व बहुत ज्यादा है |


वराहश्रुति में कहा गया है की -

मूलाद्धाराद्धि षट्चक्रं शक्तिरथानमूदीरतम् ।

कण्ठादुपरि मूर्द्धान्तं शाम्भव स्थानमुच्यते॥ 

अर्थात – मूलाधार से कण्ठ तक शक्ति का स्थान है । कण्ठ से ऊपर मस्तक तक शाम्भव स्थान है ।

सुषुम्ना नाडी का महत्व :

आत्मज्ञान की जो यात्रा होती है उसमे सुषुम्ना नाड़ी का बहुत बड़ा योगदान होता है क्यूंकि शक्ति इसी नाड़ी से ऊपर की और चलती है | इसीलिए स्वर शास्त्र में कहा गया है की जब सुषुम्ना नाड़ी चलती हो तब साधना या पूजा पाठ करना चाहिए |

  • जिव से शिव बनने की साधना की शुरुआत होती है जब कुंडलिनी जागृत होती है |
  • भोग से मोक्ष की यात्रा शुरू होती है जब महाशक्ति जागती है |
  • अन्धकार से प्रकाश की और जाने का रास्ता खुलता है जब षट्चक्र भेदन शुरू होता है |
  • आत्मज्ञान का रास्ता खुलता है |


एक बहुत बड़ा भ्रम :

एक भ्रम लोगो के दिमाग में ये भी है की कुंडलिनी साधना में घर गृहस्ती को छोड़ना पड़ता है तो ये बिलकुल गलत धारणा है | हम अपने दैनिक जीवन में कार्यो को करते हुए भी कुंडलिनी साधना कर सकते हैं | महा शक्ति की कृपा से हम अपने कार्यो को और अच्छी तरह से करने में काबिल हो जाते हैं और जैसे जैसे साधना बढती जाती है साधक के लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता है इस विश्व में|

शक्ति चक्र खजाने से भरे हैं :

हमारे अन्दर मौजूद शक्ति चक्रों में खजाने भरे हुए हैं, हर चक्र में अलग प्रकार का अनुभव और सिद्धियाँ मौजूद है | जैसे जैसे हम उन चक्रों में प्रवेश करेंगे और आगे बढ़ेंगे वैसे वैसे दिव्य अनुभूतियाँ हमे एक अलग ही अवस्था में ले जायेंगी | 

परन्तु कुंडलिनी साधना करने वालो में कुछ ख़ास विशेषताएं होनी चाहिए जैसे –
  1. इस साधना में साहस की आवश्यकता होती है क्यूंकि साधना के दौरान विभिन्न प्रकार के रोमांचित कर देने वाले अनुभव होते हैं साधक को |
  2. अपने गुरु या इश्वर पर श्रद्धा का होना बहुत जरुरी है |
  3. सबुरी भी होना बहुत जरुरी है क्यूंकि इस साधना में जल्दी मतलब खुद की हानि करना | 
  4. प्रबल आत्मबल जिससे की आप इस साधना को निश्चित रूप से कर सकें |

अब आइये जानते हैं की कौन से चक्र का कौन सा विशेष मंत्र है :

ऐसा योग ग्रंथो में बताया गया है की जैसे जैसे जैसे साधक षट्चक्र भेदन करता जाता है उसे इन मंत्रो का अनुभव भी होता जाता है | परन्तु जो साधक इन शक्ति चक्रों का अनुभव मंत्रो से करना चाहते हैं वे इन मंत्रो का प्रयोग कर सकते हैं समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में |

  1. मूलाधार चक्र का मंत्र है  –  ॐ लं परम तत्वाय गं ॐ फट |
  2. स्वाधिष्ठान चक्र का मंत्र है – ॐ वं वं स्वाधिष्ठान जाग्रय जाग्रय वं वं ॐ फट |
  3. मणिपुर चक्र का मंत्र है – ॐ रं जाग्रनय ह्रीम मणिपुर रं ॐ फट 
  4. अनाहत चक्र का मंत्र है –  ॐ यं अनाहत जाग्रय जाग्रय श्रीं ॐ फट 
  5. विशुद्ध चक्र का मंत्र है –  ॐ ऐं ह्रीं श्रीं विशुद्धय फट 
  6. आज्ञा चक्र का मंत्र है –  ॐ हं क्षं चक्र जगरनाए कलिकाए फट 
  7. सहस्त्रार चक्र का मंत्र है – ॐ ह्रीं सहस्त्रार चक्र जाग्रय जाग्रय ऐं फट 

शक्ति चक्रों के बीज मंत्र इस प्रकार से हैं :

  1. मूलाधार –  लं 
  2. स्वाधिष्ठान–  वं 
  3. मणिपुर – रं 
  4. अनाहत–  यं 
  5. विशुद्ध –  हं 
  6. आज्ञा –  ॐ 
  7. सहस्त्रार –  ॐ 

विशेष बात जो जानना चाहिए हर साधक को :

कुंडलिनी साधना के दौरान साधक को सिद्धियाँ मिलती है इसमें कोई शक नहीं परन्तु जो साधक सिद्धियों में फंस जाता है वो आगे की यात्रा नहीं कर पाता है, वो सिद्धियों के माया में उलझ कर रह जाता है और जीवन बर्बाद हो जाता है अतः अति सावधान रहने की जरुरत होती है | किसी भी प्रकार के मोह, लालच से दूर रहे और अपनी यात्रा को जारी रखें क्यूंकि आगे बहुत दुर्लभ सुख और अनुभूतियाँ आपका इन्तेजार कर रही हैं |

आइये थोडा विस्तार से जानते हैं शक्ति चक्रों के बारे में :

मूलाधार चक्र:

इसे रूट चक्र भी कहते हैं और ये स्थान गुदा और लिंग मूल के मध्य में स्थित है जो अन्य स्थानों से कुछ उभरा सा महसूस होता है। इस दिव्य स्थान में कुण्डलिनी-शक्ति साढ़े तीन फेरे में लिपटी हुई शयन-मुद्रा में रहती है।

इस चक्र का सम्बन्ध पृथ्वी तत्त्व से है और इस चक्र के जागृत होने से साधक के अन्दर से लालच ख़त्म होने लगता है और साथ ही पृथ्वी तत्त्व को वो बहुत गहराई से समझने लगता है |


स्वाधिष्ठान चक्र:

इसे scaral-chakra भी कहते हैं और इस शक्ति चक्र का स्थान नाभि और मूलाधार के बीच में होता है |

इस चक्र का सम्बन्ध जल तत्त्व से है |

स्वधिस्थान चक्र के जागने पर साधक के अन्दर से आलस्य ख़त्म होने लगता है , दया भाव जागृत होता है, पराविज्ञान पर पूर्ण विस्वास होने लगता है और जल तत्त्व को वो और गहराई से समझने लगता है |


मणिपुर चक्र:

इस स्थान को Solar plexus chakra भी कहते हैं और इसका स्थान है नाभि मूल |

इस चक्र का सम्बन्ध अग्नि तत्त्व से है |

मनिपुरक चक्र के जागने से साधक के अन्दर से क्रूरता ख़त्म होने लगती है, भूख पर नियंत्रण होने लगता है, अहंकार ख़त्म होता है, शरीर  में नई उर्जा बहने लगती है | साधक को अग्नि तत्त्व को बहुत गहराई से समझने लगता है |


अनहत चक्र :

इस चक्र को Heart chakra भी कहते हैं और इसे हृदय-गुफा भी कहते हैं | 

इस चक्र का सम्बन्ध वायु तत्त्व से है | 

अनहद चक्र के जागने से साधक के अन्दर समाधी लेने की शक्ति आ जाती है, दिव्यानंद की प्राप्ति होती है,श्रद्धा और प्रेम जागृत होता है। साधक वायु तत्त्व को और गहराई से समझने लगता है |


विशुद्ध चक्र :

इसे throat chakra भी कहते हैं और इसका स्थान कण्ठ है | इस चक्र का सम्बन्ध आकाश तत्त्व से है | 

विशुद्ध चक्र के जागने पर जातक को वाक् सिद्धि प्राप्त होती है, गायन वादन में महारत हासिल होती है | 


आज्ञा चक्र :

इसे Third eye chakra भी कहते हैं और इसका स्थान भ्रू-मध्य है | 

आज्ञा चक्र के जागने से साधक के बंधन टूटने लगते हैं, उसे सब तरफ शिव का आभास होने लगता है, उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है | साधक माया को समझने लगता है | उसे त्रिकाल का ज्ञान होने लगता है |


सहस्त्रधार चक्र : 

इसे crown-chakra भी कहते हैं और ये शिव का स्थान है | इसका स्थान मस्तिष्क है इसे हम ब्रहमरंध्र भी कहते हैं |

सहस्त्रधार चक्र जागृत होते ही साधक को सर्व सिद्धियाँ मिल जाती है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, अनंत लोक का ज्ञान होता है , वह पूर्ण होता है। वह देव तुल्य होता है, वो शिव हो जाता है | 

आइये जानते हैं कुण्डलिनी शक्ति जगाने के क्या लाभ है ?

  • ७२००० नाड़ियों का शोधन होने लगता है |
  • शरीर में नई उर्जा बहने लगती है |
  • साधक को कुशाग्र बुद्धि की प्राप्ति होती है जिससे वो अपने कार्यो को बहुत ही अच्छे और सच्चे तरीके से कर पाता है | 
  • साधक सुख और दुःख के भ्रम को समझने लगता है, अज्ञान का नाश होता है| साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है जिससे उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता है | अंतर शांति की प्राप्ति होती है |  
  • साधक समाधि का लाभ ले पाता है |
  • शिवम् विद्द्यते न क्वचित का अर्थ पता चलता है |

कुंडलिनी शक्ति को कैसे सक्रिय करें?

भारतीय योग ग्रन्थों के अनुसार हट योग करते हुए साधक मूलबंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध और कुंभक का अभ्यास करते हुए महाशक्ति कुंडलिनी को जगा सकता है | परन्तु एक स्वस्थ शरीर और शक्तिशाली मन की जरुरत होती है | 

एक और आसान तरीका है जिसमे की शक्तिपात समर्थ गुरु के आशीर्वाद से साधक शक्ति को जगा के अहम् ब्रहास्मी के अनुभव की साधना को शुरू करता है | 

जैसे जैसे साधक कुंडलिनी शक्ति के साथ यात्रा करता है वैसे वैसे उसका जीवन परिवर्तित होता जाता है, हर क्षण एक नया अनुभव उसे रोमांचित करता रहता है | 

तो कुंडलिनी साधना सभी के लिए आवश्यक है और सत्य को समझने के लिए भी जरुरी है |

उम्मीद है आपको कुंडलिनी शक्ति के बारे में उपयोगी जानकारी मिली होगी और आप अपने जीवन को पूरी तरह से रूपांतरित करने का प्रयास करेंगे|

अगर आप कुंडलिनी साधना करते हैं तो अपने अनुभवों को साझा करें कमेंट के माध्यम से |

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का मंगल हो किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

इन्हीं मंगलकामनओं के साथ  आप सबको शक्ति चक्र साधना के लिए शुभकामनाएं |

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