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Hindi Jyotish

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Sansarik Pralobhano Ka Jaal

सांसारिक प्रलोभनों का जाल, कैसे मनुष्य नश्वर वस्तुओं का आनंद लेते हुए आखरी में पछताता है?, कैसे छला जाता है मनुष्य इस दुनिया में.
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||श्री गुरु देव शरणम् ||

संसार एक ऐसी मायावी दुनिया है जहाँ मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं को साकार करते हुए अपने आपको उलझा रखा है और अपने आप से ही दूर हो गया है.
इंसान इस दुनिया में आता तो अकेला ही है और खाली हाथ भी, परन्तु इस दुनिया में प्रवेश करते ही वो ना-ना प्रकार के प्रलोभनों में फंसता चला जाता है. बचपन में खिलौने और पढ़ाई, युवा अवस्था में ताकत हासिल करना, विवाह करना, काम क्रीड़ा का आनंद लेना, बच्चे पैदा करना, नौकरी करना, अपने स्टेटस को बढ़ाना, ऐशो आराम की चीजो को बढ़ाते  रहना आदि और इस प्रकार पूरा जीवन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता है. बुढ़ापे में या तो बिस्तर पकड़ के अपनी आखरी सांस की प्रतीक्षा करता है या फिर अपने बच्चो की सेवा चाकरी में लगा रहता है.

समय निकलने के बाद पता चलता है की “माया मिली ना राम”

भगवान् की सारी रचनाओं में से सिर्फ इंसान ही ऐसी रचना है जिसके पास अथाह शक्ति है, विवेक है. इंसान ने अपनी साधना, तपस्याओ द्वारा असंभव को भी संभव किया है परन्तु इन सब उदाहरणों को एक तरफ रखते हुए आज का मनुष्य सिर्फ नश्वर को प्राप्त करने और उसे भोगने को ही अपना उद्देश्य समझने लगा है.

जहाँ तक ईश्वर आराधना की बात आती है तो वो तभी करता है जब कोई कष्ट आता है या फिर प्राप्त से ज्यादा प्राप्त करने में मनुष्य नाकाम होने लगता है.

सांसारिक सुखो को भोगने की ईच्छा के बढ़ने से दूसरी तरफ अध्यात्मिक मार्ग को दिखाने वाले संस्थाओं का भी चलन बढ़ चला है परन्तु दुःख की बात ये है की बिना प्राप्ति के ये राह दिखाने चल पड़े हैं, अधिकतर संचालको को तो अध्यात्म की रूप-रेखा ही नहीं पता होती है, बिना मंजिल पे पंहुचे लोग दुसरो को मार्ग दिखाने में लगे हुए हैं. 
जो अध्यात्म के चरम पे हैं वो अपने ही आनंद मे मग्न है, उन तक पंहुचना साधारण व्यक्ति के बस से बाहर है, आज तो जो हमे थोडा सा प्रलोभन देदे, हम उसकी तरफ चल पड़ते हैं. 
जहाँ बात कठिन साधनाओ की होती है वहां से व्यक्ति अपने आपको दूर करने में लग जाता है. 

मंत्र-तंत्र-योग आदि प्रलोभनों का जाल :

आज दुकानों में और गूगल में भी देखा जाए तो लोग सबसे ज्यादा उन चीजो को ढूँढने मे लगे हैं जो की सुलभता से प्राप्त नहीं हो सकती है. आधे अधूरे ज्ञान को इन्टरनेट में डालके लोग सिर्फ धन को आकर्षित कर रहे हैं और लालच में आके दुसरे उनका प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते हैं. 
जल्दी से जल्दी सफलता पाने की होड़, जल्दी से जल्दी सभी सुखो को भोगने की होड़ ने समाज में एक अजीबोगरीब नजारा पैदा कर दिया है. 
यू ट्यूब में देखे तो कोई यक्षिणी सिद्ध करने की विधि बता रहा है, कोई कुंडलिनी जागरण करवा रहा है, कोई बैताल सिद्धि करवा रहा है, कोई त्रिकाल सिद्धि करने की विधि बता रहा है, और सबसे दुःख की बात ये है की लोग बिना सोचे समझे इन्हें देख भी रहे हैं, सुन भी रहे हैं और प्रयोग भी कर रहे हैं. कई लोग घोर नुक्सान कर बैठते हैं, कई मानसिक विकार से पीड़ित हो रहे हैं और भी बहुत कुछ हो रहा है जिसके बारे में तो नेट में आता ही नहीं है. 

क्यों धोखा खा रहा हैं इंसान आज ?

आज अगर कोई धोखा खा रहा है तो उसका कारण है लालच, जल्द से जल्द सफलता पाने का लालच, दुसरो को हारने की भावना.  हम ये भूल जाते हैं की साधना कोई मजाक नहीं और किसी भी प्रकार की साधना में सफलता के लिए गुरु के मार्गदर्शन में साधना होना चाहिए. हम जितने में सफल सिद्धो की जीवनी पढ़ ले, सभी में हमे उनके कठिन साधना के विषय में पढ़ने को अवश्य मिलता है. जबकि इस कलयुग में हम सिर्फ १०८ बार मन्त्र जपके सिद्धि प्रपात करने में लगे रहते हैं और जब कुछ होता नहीं है तो लग जाते हैं भगवान् को कोसने, भाग्य को कोसने.

भटकाव का असली कारण:

आज सभी भटक रहे हैं और जब पूछा जाता है की क्यों भटक रहे हो, क्यों परेशान हो तो जवाब मिलता है, नौकरी में तरक्की नहीं, घर में शांति नहीं, मन विचलित है, बिमारी जाती नहीं आदि.
देखा जाए तो परेशानी अमीर को भी है और गरीब को भी और सत्य ये भी है की भारत के कुछ लोग जो योग साधना में सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं वे सही मायने में सुखी है और प्रसन्न होके जीवन को जी रहे हैं.
जब हम सिद्धो की जीवनी पढ़ते हैं तो उसमे हमे एक सन्देश मिलता है की “नश्वर चीजो के पीछे भागोगे तो हाथ कुछ भी नहीं लगेगा ” अतः मनुष्य को ईश्वर प्राप्ति की और ध्यान लगाना चाहिए.
काम, क्रोध, लालच, घृणा को त्याग के हमे योग का अभ्यास करना चाहिए, तभी असल शान्ति की प्राप्ति हो सकती है. 

सांसार बन्धनों से बचने के लिए सही गुरु की शरण:

सत्य तो यही है की “गुरु कृपा ही केवलम”अर्थात गुरु कृपा प्राप्त होने पर ही सही मायने में कल्याण संभव है. अब यहाँ सवाल ये उठता है की गुरु किसको बनाएं क्यूंकि सही गुरु की पहचान नहीं है. तो इसके लिए सिद्धो ने कहा है की आप सबसे पहले अपने विवेक का स्तेमाल करके इस संसार को थोडा समझने का प्रयास करे फिर जब आपको इसकी नश्वरता का भरोसा हो जाए तो आप फिर शाश्त्रो में दिए निर्देश के हिसाब से ध्यान और भजन में मन को लगाए, इससे आपकी बुद्धि और मन निर्मल होती चली जायेगी और समय आने पर आपको सही गुरु की प्राप्ति हो जायेगी.
मनुष्य को सबसे पहले पुरुषार्थ करते हुए सही मार्ग में आगे बढ़ना होगा, अपने कर्मो को करते हुए ईश्वर को हमेशा याद करते रहना और प्रार्थना भी करते रहना ही सबसे श्रेष्ठ मार्ग है जब तक की गुरु की प्राप्ति ना हो जाए.

सद्गुरु प्राप्ति की महानता :

कबीर दास जी ने तो स्पष्ट कहा है की :
चलती चक्की देखके दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में साबत बचा ना कोई||


अर्थात सुख और दुःख के चक्रव्यूह के बीच में फंस के कोई बच नहीं पाया है. अतः गुरु रूपी डंडे का सहारा जरुरी है. 
जब सच्चे गुरु की प्राप्ति होती है तो फिर साधना करने से व्यक्ति को अंतर्दृष्टि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति आत्मज्ञान के मार्ग पर निडर होक चल पड़ता  है. शिष्य को सबकुछ सुलभ होने लगता है. ज्ञान के प्रकाश से उसका जीवन जगमगा उठता है और फिर सारे दुखो का अंत हो जाता है.

प्रेम, भक्ति, आनंद से उन्मुक्त होके साधक जीवन जीने लगता है.
अतः मनुष्य को चाहिए की सांसारिक प्रलोभनों को समझ के, इनकी नश्वरता को जानके कुछ ऐसा प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करे जिसे कोई चुरा नहीं सकता, जिसे कोई छीन नहीं सकता.
जिस पर गुरु कृपा हुई उसके पास सारे सुख, वैभव अनायास ही आ जाते हैं परन्तु जो सिर्फ माया के पीछे भागता है उसे ना माया मिलती है और ना ही राम.

जीवन आपका, यात्रा आपकी प्राप्ति आपकी
सही सोचिये और सही निर्णय लीजिये

||श्री गुरु देव शरणम् ||

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